कहानी स्कूल बैग की
प्यारे बच्चो ! आज हम आपको
एक कहानी सुनाने जा रहे हैं,जिसका नाम है “ब से
बस्ता ।“ क्या आप
लोग बस्ता
क्या है जानते हैं ? बस्ता मतलब स्कूल बैग , ब-से बस्ता भ- से भारी । क्या आप लोगों को स्कूल बस्ता भारी
मालूम पड़ता है ? चलो ! आज हम उस भारी
भरकम बस्ते की कहानी सुनाएँगे आपको ।
एक थी बच्ची , नाम था ईशा । बहुत प्यारी है , अपने पिताजी की इकलौती बेटी थी
वह, गाँव के पास वाले बाज़ार में पिताजी की
दूकान थी ।दूकान से जो कमाते थे , उसी से गुजारा होता था।स्कूल जाने की उम्र हुई तो पिताजी ने उसे पास
वाले विद्यालय में भेज दिया । पहले दिन तो वह अपने
पिताजी के साथ स्कूल हँसते-हँसते चली गयी ।दूसरे
दिन स्कूल के नाम से ही उदास हो गयी थी । “ पापा !
मैं
नहीं जाऊँगी स्कूल ” सिसकती
हुई
उसने कहा । पापा ने गोद में उसे उठाया-“चाकलेट
ला
दूंगा बेटा ! लाल्ली पप खाना है न तुमको? चलो ! चलों ! स्कूल चलेंगे हम । प्यार
भरी आवाज में पिताजी ने कहा । “ईशा मुस्कराई और स्कूल के
लिए तैयार हो गयी । सहपाठियों के साथ घुल मिल कर
उसका बचपन मानो खुशियों की हिलोरें
ले रहा था ।कभी कभी स्कूल के बोझ से उसका मन उचट रहा था ।
एक दिन की बात है , अचानक ईशा स्कूल जाने से मना कर दिया
।
स्कूल जाने का टाइम हो गया ईशा ! तैयार हो जाओ -
पिताजी ने ऊंचे स्वर मे आवाज दी । “नहीं पापा ! मैं स्कूल
नहीं जाऊँगी ।“ ईशा रोनी सूरत में
जबाब दिया।क्यों
बेटा ? क्या हुआ ? पिताजी ने आश्चर्य से पूछा
। ईशा ने कहा – नहीं ! पापा ! वह भारी भरकम बस्ता ........ मैं नहीं उठा
सकती । देखो! मेरे कंधे कैसे लाल पड़ गए हैं इसे उठाते उठाते । चलो मैं तुम्हें छोड़ आता हूँ स्कूल । पिताजी
ने प्यार से कहा । फिर ईशा
स्कूल चली गयी ।
आज ईशा स्कूल
से लौटते वक्त
रो रही थी । माँ ने उसे समझा बुझा कर खाना
खिलाया और सुला दी ।
ईशा का
छोटा-सा मन उस स्कूल बैग की दुनिया में गोते लगा रहा था ।सपने
में
बड़बड़ाते हुए कहा “नहीं !
मुझे तुम्हारे साथ नहीं जाना है , मैं यह बस्ता
नहीं ढो सकती ।“इतने मोटू बैग
को कौन उठाएगा ? इस में मेरी
क्या गलती
है बैग ने रूआँसे भरी आवाज़ में कहा । तू इतना मोटू है, यही तेरी गलती है – ईशा ने शिकायत भरी आवाज
में
कहा । मैं खाते
पीते घर का हूँ इसलिए हेल्दी हूँ,
मोटू नहीं । बैग ने ईशा की बात को काटते
हुआ जबाब दिया । तुझे जो भी मिलता है जैसे भी मिलता है सबकुछ ठूस लेता
है । मेरा टिफ़िन बॉक्स , लंच बॉक्स ,वॉटर बोटल,बिस्कुट , आलू की चिप्स न जाने
क्या-क्या । और तो और किताब ,कापियाँ
, हर सब्जेक्ट
के अलग अलग नोट्स ,कलम ,पेंसिल, ज्यामेट्री बॉक्स , सब कुछ तेरे पेट के अंदर.... न जाने और क्या-क्या ।
बैग ने कहा” मैं क्या करूँ ? “ अभिभावक मुझे
प्यार ही इतना करते हैं की ....मम्मी भी तेरे से ज्यादा मुझे प्यार करती है ,तभी तो मुझे तुझ से ज्यादा
खिलाती है ।वैसे कोई प्यार से खिलता है तो कैसे मना कर सकता हूँ ।
हाँ ! हाँ ! तुम क्यों
मना करोगे ? थोड़ी न
तुम्हें मेहनत करनी पड़ती है? मुझे तो कोल्हू की बैल की
तरह ढोना
पड़ता है तुम्हें । लगता है स्कूल मे एड्मिशन मेरा
नहीं तेरा हुआ है । हाँ ! हाँ ! सच कहा तुम ने -मम्मी
तुम्हें ज्यादा प्यार करती है, इसलिए तुम्हें मम्मी ने
नाम दिया है राजा बेटा । मैं ठहरी नौकरानी ।ईशा गुस्से से बोली जा रही थी।
मम्मी ने
कहा “देखो ईशा !स्कूल
बैग के बिना पढ़ाई नहीं हो सकती , टीचर की सारे होम वर्क इस में रहता है, इस में तुम्हारी सारी जरूरत की चीजें हैं । ईशा ने झुंझलाते हुआ कहा “ये मेरी जरूरत की
चीजें नहीं टीचर की है । सभी टीचर को अलग-अलग कापियाँ रोज रोज चाहिए ।आखिर क्यों ?” ।देखो!
मेरे कंधे पे छाले पड़ गए हैं ।
कमर मे बहुत दर्द है ।मैं थक गयी हूँ
मम्मी ।मेरी सहेली नफीशा कहती है रोज
उसकी मम्मी मरहम लगाती है उसकी कमर पे ।
मैं नहीं जाऊँगी मम्मी स्कूल बैग के साथ ।“मैं नहीं
...मैं नहीं ....जाऊँगी “ईशा चिल्ला
रही थी । उसकी मम्मी आ कर उसे बोली – ईशा ! क्या हुआ ? क्यों चिल्ला रही हो बेटी ? तब जाकर ईशा की नींद खुली । ईशा अचरजभरी नज़र से मम्मी को देखी जा रही थी ।अचानक उसकी नज़र
स्कूल बैग पर पड़ी । उसे देखते ही वह
चिल्लाने लगी जैसे कोई डरावना दृश्य हो ।इस समय पिताजी की आवाज सुनकर ईशा पिताजी के पास दौडकर
गई और बोली “पापा ! मेरा बैग कल से हल्का हो
जाएगा न ?”ये सुनकर पति-पत्नी दोनों एक दूसरे
को देख
रहे थे ।
दिलीप कुमार बड़त्या जवाहर नवोदय विद्यालय ,बौद्ध,ओड़िशा
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