हरिशंकर परसाई  और ओड़िआ व्यंग्यकार फतुरानंद की कहानियों  में व्यंग्य :

एक तुलनात्मक अध्ययन

उपक्रम : हिंदी व्यंग्य की राष्ट्रीय परंपरा में परसाई जी सबसे अधिक उल्लेखनीय लेखक माने जाते हैं। परसाई की व्यंग्य चेतना एक गहरे सामाजिक दायित्वबोध से पैदा हुई है। वे एक लेखक की हैसियत से अपने समय की चुनौतियों का सामना करते हैं। उनकी लेखन कला अनुभवों की व्यापकता और विचारों की गहराई दोनों से संपन्न है। वैसे तो हिंदी साहित्य में भारतेंदु युग से व्यंग्य कहने की परंपरा थी,परन्तु परसाई जी व्यंग्य को एक विधा का रूप दिया और उसी को माध्यम बनाकर उन्होंने व्यंग्यात्मक कहानियाँ लिखीं ।उसी प्रकार ओड़िआ साहित्य की कहानी के विकास में फतुरानंद की कहानियाँ अनन्य और असाधारण है। वैसे तो ओड़िआ साहित्य की व्यंग्य परंपरा के प्रतिष्ठित कहानीकार फकीरमोहन सेनापति की कहानियों में पाई जाती है। आगे चलकर इसी व्यंग्य साहित्य की धारा में गोदावारिश महापात्र, जदुमणि, गोपालचन्द्र प्रहराज, बलदेव रथ इत्यादि लेखकों का योगदान रहा। भारत की स्वतंत्रता के उपरांत ओड़िआ व्यंग्य साहित्य में उत्पन्न खालिपन को अपने हास्यरसपूर्ण व्यंग्य लेख से भरने का श्रेय प्रतिष्ठित व्यंग्यकार फतुरानन्द को ही जाता है। कहानी की मौलिकता और संवेदना की गहराई की दृष्टि से फ़तुरानंद ने ओड़िआ व्यंग्य कहानी लेखन में अपनी प्रतिभा का परिचय दिया है।

परसाई और फ़तुरानंद जी का वैशिष्ट्य :

परसाईजी ने तत्कालीन सामाजिक विसंगतियों, पाखंड और भ्रष्टाचार के कारणों को ढूंढ ढूंढ कर बेबस लाचार आदमी का हौसला बढ़ाया । उन्होंने अपने समय के सामाजिक, राजनैतिक, शैक्षिक और आर्थिक परिवेश में व्याप्त विसंगतियों को परखा और उनका खुलकर विरोध किया । जो स्थिति हिन्दी साहित्य के समकालीन कहानिकारों के बीच परसाईजी की है, वही स्थिति ओड़िआ कहानी में फतुरानंद जी की है अतः दोनों कहानीकारों की कहानियों का मूल्यांकन वर्गीकृत अध्ययन किया जा सकता है

परसाई और फतुरानंद की कहानियों का वर्गीकृत अध्ययन :

        I.         राजनैतिक कहानियाँ:

परसाई और फतुरानंद ने राजनैतिक विषयवस्तु पर बहुत-सी कहानियाँ लिखी हैं। एक और फतुरानंद ने भारतीय राजनीति को दृष्टि में रखते हुए अन्तराष्ट्रीय  राजनीति पर अपने पौनी नजर डाली है। उन्होंने दो महान शक्तिशाली देश अमेरिका और रुस पर व्यंग्य करते हुए “शिमिलि तुला” कहानी में एक को पूँजिपति  बम और दूसरे को सर्वहरा बम कह दिया हैं । दूसरी ओर परसाई जी राजनीति से संबंधित “भेड़े और भेड़ियेकहानी में बूढा सियार को पूँजिपति राजनेता का प्रतिक माना है , जो अन्य अफसरों की मदद से निरीह जनता पर जुल्म जमाये हुए हैं । 

II.    ससामाजिक कहानियाँ :

परसाई और फतुरानंद की कहानियाँ उनके जीवनानुभव को दर्शाती हैं   अतः स्वभाविक हैं कि दोनों की कहानियों में सामाजिक जीवन की तस्वीर  उभरता हैं ।  एक ओर  “ सेवा का शोक ” कहानी में रइसों की सेवा करने की शोक पर तीखा व्यंग्य है तो दूसरी ओर “ एक मध्यवर्गीय कुता ” कहानी में  समाज के मध्यवर्गीय व्यक्तियों के चरित्र पर व्यंग्य किया गया है ।फतुरानंद की कहानियों में हास्यरस के गहराई के साथ–साथ स्वस्थ सामाजिक जिम्मेदारी का दर्शन होता है ।कहीं-कहीं उनकी कहानियों में आधुनिक समाज ही कथ्य के रूप में  सामने आता है । उनकी प्रत्येक कहानी वास्तव धर्मी है । उन्होंने “ कलिकती चेंक ” कहानी के माध्यम से समाज में  फैले  नकारात्मक पहलू को उभारने का भरसक प्रयास किया है।

III.    साहित्यिक  तथा शैक्षणिक कहानियाँ :

परसाई जी  और फतुरानंद जी  अपनी कहानियों  में शिक्षा, साहित्य जगत भारतीय संस्कृति की बिड़म्बनाओं का चित्रण किया हैं । दोनों लेखकों की साहित्यिक  कहानियों में समान प्रवृतियाँ पाई जाती हैं। फतुरानंद की “साहित्य मारु” कहानी में अपनी प्रतिष्ठा को बनाए रखने के लिए साहित्य में चल रहे चौर्य प्रवृत्ति  पर व्यंग्य किया गया है । “बहादुरी के बीके” कहानी में  परसाई जी उन लेखकों पर  व्यंग्य किया हैं , जो नीति – अनीति से जैसे भी  हो सके अपनी पुस्तकों पर अधिकतम लाभ कमाना चाहते हैं । ‘रिसर्च का चक्कर’ में  उन आचार्यों पर व्यंग्य है  जो शोध के नाम पर छात्रों से अपनी निजी स्वार्थ की पूर्ति करवाते हैं । फतुरानंद की “भालू कवि” में आधुनिक कवियों पर तीखा व्यंग्य किया गया हैं । परसाईजी ‘अपने –अपने ईष्टदेव’  में  साहित्य के क्षेत्र में व्याप्त विसंगतियों पर व्यंग्य किया है ।

IV.   धधार्मिक कहानियाँ :           

परसाई की कहानियाँ विषय की दृष्टि से वैविध्यपूर्ण है । उन्होंने अपने कहानियों में समाज के साथ धर्म को भी महत्व दिया है  । फतुरानन्द की ‘खेचेरिबाबा’ परसाई की ‘एक गोभक्त की भेंट, टार्च बेचनेवाला’ अदि कहानियों में  धर्म की कुरूपता और अंधविश्वास पर व्यंग्य  किया गया हैं ।

शिल्पगत – अध्ययन : परसाई और फतुरानंद की कहानियो मे प्रयुक्त भाषा अत्यंत सरल और सहज है।  उनकी कहानियाँ पाठकों पर पूर्ण प्रभाव छोड़ती हैं । परसाई जी हिंदी की उक्तियों , कहावतों और मुहवरों  का पुरातन भंडार को निकाल फेंका हैं । अपनी कहानियों के द्वारा उन्होंने नयेयुग की आवश्यकता के अनुरूप खड़ीबोली की सम्प्रेषण क्षमता को बढ़ाया । फतुरानन्द की वाक्य सरंचना में उपमा और अनुप्रास की छटा देखने को मिलती है। उन्होंने ग्रामीण अप्रचलित शब्दों के प्रयोग में नवीनता दिखाई है । कहीं-कहीं हास्य रस और व्यंग्य के मिश्रण से कहानी में रोचकता आ गयी है ।

निष्कर्ष :

परसाई और फतुरानंद की कहानियाँ पाठकों के दिलों दिमाग में एक हलचल पैदा करती हैं उनकी बातें और विचार पाठकों की चेतना का हिस्सा बन जाता है।कहा जाता है परसाई छिद्रान्वेषी हैं , किन्तु यह छिद्रान्वेषण समाज के बिसंगतियों को दूर करने के लिए हुआ है। फतुरानन्द की कहानियों में भी अश्लीलता तथा नारी के रूप वर्णन की आतिशयोक्ति का आरोप हुआ है,परन्तु उनका ये वर्णन विषयवस्तु को समग्रता प्रदान करने के लिए हुआ है।संक्षेप में परसाई और फतुरानंद की कहानियों का कथ्य जहाँ विराट है, वहीँ उसका शिल्प–विधान मौलिक है एवं उनका व्यंग्य उत्कृष्ट हैं।  

लेखक–दिलीप कुमार बाडत्या                                                      पी.जी.टी.(हिंदी)जवाहर नवोदय विद्यालय,                                                   पल्झर,बौध ,ओडिशा

dbadatya@gmail.com                                              www.dillipbadatya.in                                                                                                

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